February 21, 2013

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સમય ના સમીકરણ ને સમજી શક્યો નહીં વ્યવહાર ના વ્યાકરણ ને સમજી શક્યો નહીં સમય સમય ના હિસાબે વહે, જાણે છે "માનસ" પણ સમય ના સમય નો હિસાબ સમજી શક્યો નહીં ચૂકવી દીધું છે બધું પણ વ્યાજ હાજી બાકી છે સંબંધ ના ચક્ર વૃદ્ધિ વ્યાજ ને સમજી શક્યો નહીં કારણ કોઈ પણ હોય હપ્તો કદી ચૂક્યો નથી પણ લાગે છે હાજી ચૂકવવા ની શરૂઆત થવી બાકી છે વહી ગયો સમય, વ્યાકરણ-સમીકરણ બદલાયા નથી જ્યારે પણ પાછળ વળી જોઉં છું અવાજ આવે છે આગળ થી આગળ જો "માનસ" હજી ઘણું ચૂકવવા નું બાકી છે તસ્વીર લાગી ગયી દીવાન-ખાના માં ફૂલો પણ ચઢી ગયા જેટલાઆવે દિલસોજી માટે અશ્રુભીની આંખે, લેણદાર લાગ્યા દરેક ના ચહેરા પર ઍક્જ પ્રશ્ન જોઉં છું, તમે તો ચાલ્યા ગયા કોણ ચૂકવશે હવે જે તમે કયારેય લીધું હતું.....નહીં સમય ના સમીકરણ ને સમજી શક્યો નહીં

यही जिंदगी की छोटी सी दुकान थी

August 27, 2012

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कुछ आँसू थे कुछ मुश्कान थी
यही जिंदगी की छोटी सी दुकान थी
कुछ खरीदा, कुछ मुफ़्त में मिला
कुछ रिश्तेदारी में उधार मिल गया
इसी तरह जिंदगी का व्यापार चल गया
कहाँ होता है ऩफा इस व्यापार में
जो भी ऩफा होता है उसमें से
कुछ कर्ज़ चुकाने में चला जाता है
कुछ रिश्ते निभाने के फर्ज़ में
मगर इन बातों से दुकान अंजान थी
बही-ख़ाता लिखने बैठा तो सही
मगर कलम कांप रही थी
और जिंदगी की दुकान हाँफ रही थी
अब तो धीरे धीरे शाम हो रही थी
दुकान बंद करने का वक़्त हो गया था
इस कदर जिंदगी थक गयी थी जिंदगी से
पता नहीं कल फिर दुकान खुलेगी या नहीं
पता नहीं जिंदगी का कर्ज़ मिटेगा या नहीं
आँसू व्यापार बन गये हैं और
मुश्कान कारोबार बन गये हैं
जिंदगी 'बिचारी' दुकान बन गयी है
रिश्ते मुनाफ़ा करने का आधार बन गये हैं
'मानस' तू भी कहाँ बाकी रहा इन बवाल से
तभी तो सभी बुलाते, तुझे व्यापारी के नाम से

कुछ आँसू थे... कुछ मुश्कान थी 
यही जिंदगी की छोटी सी दुकान थी

July 23, 2012

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कब तक महफूज़ रखूं अपने दो हाथों से,
उन लौ को आँधियों से
जब की बाती ने ही भरोसा छोड़ दिया है,
सुबह होने का
ज़ेरे-आब में सख्सियत मिट गयी इंशा तेरी,
किनारे खड़े खड़े
गनीमत समझ ए ख़ुदा नहीं माँगा सबूत तुझसे,
तेरे ख़ुदा होने का
दिल कभी इतना मायूस न हुआ 'मानस' मेरा
टूटने पर भी
लोगों ने न जाने क्यूँ सारे इल्ज़ाम लगाए मुझ पर
तुझसे जुड़ा रहने का
7-23-2012

May 30, 2012

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जिंदगी को जब भी करीब से देखता हूँ
हर बार अलग अलग सी दिखाई देती है
तेरी ज़ुल्फो को जब जब सहलाता हूँ
लगता है जिंदगी कुछ उलझ सी गयी है
तेरी उदास आँखों में जब नमी देखता हूँ
ऐसा लगता है जैसे छत टपक रही हो
जिंदगी को किस नज़रिए से देखूं
हर बार अलग ही दिखाई देती है
जब जब कदम बढ़ता हूँ तेरी तरफ
लगता है जैसे मंज़िल भटक गयी हो
सब कुछ सही था मगर न जाने क्यूँ
हर जगह ग़लत ही करार दिया गया हूँ
जो हरदम करीब रहती थी मेरी साँसों के
उसी जिंदगी का दम घुटता है करीब आने से
जिंदगी को जब भी करीब से देखता हूँ
हर बार अलग अलग सी दिखाई देती है

May 7, 2012

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नहीं आता मुझे जिंदगी को सजाकर रखना''मन' की बात सब को बता देता हूँ मैं
नहीं छुपा सकता राझ घर की चार दीवारों में
हर अजनबी को घर का पता बता देता हूँ मैं
नहीं एक भी दुश्मन मेरे, फक्र है इस बात का मुझे
हर किसी को बस अपना दोस्त समझ लेता हूँ मैं
औकात क्या है मेरी ये बताने के लिए
हर महफ़िल में बाक़ायदा बुलाया गया है मुझे
फिर भी उनकी शान में दो शेर सुना देता हूँ मैं
नहीं आता मुझे जिंदगी को सजाकर रखना

''मन' की बात सब को बता देता हूँ मैं

April 25, 2012

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बहोत दौड़ लिया जिंदगी की जद्दो-जहत में
अब ठहर ज़रा जिंदगी के लिए
जी लया जी भर के खुद के लिए
थोड़ा जी ले जिंदगी के लिए, फिर देख
थक गया होगा खुद का बोझ उठाकर
किसी ग़रीब का दर्द उठाकर देख
बरसों से यही रोना है की हम इंसान हैं
कभी दर्द से जुदा नहीं हो सकते
कहना बहोत है आसान की हम इंसान हैं
पहले इंसान बन कर के तो देख
बहोत रूलाया है तूने सब को
अपनी खुशियों के लिए
कभी अपनी ही आँख के
आँसू बन कर के तो देख
दर्द को तूने देखा होगा ग़रीब का करीब से
कभी खुद दर्द का एहसास कर के तो देख
इलाज किए होंगे तूने कई मरीजों के ए हकीम
कभी खुद मरीज बन कर के तो देख

सच ...

April 14, 2012

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धीरे धीरे शाम ढल रही है
परछाईयाँ लंबी हो रही है
लेकिन किस खूबसूरती से
जिंदगी कम हो रही है